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🚩माता शरण कौर 🚩

माता शरण कौर

माता शरण कौर — साहिबज़ादों के अंतिम संस्कार की अमर गाथा

चमकौर के युद्ध (1704 ई.) के पश्चात जब साहिबज़ादा अजीत सिंह जी और साहिबज़ादा जुझार सिंह जी धर्म और खालसा की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, तब युद्धभूमि भय, रक्त और सन्नाटे से भर चुकी थी। मुगल सेना की उपस्थिति और आतंक के कारण कोई भी उनके पवित्र पार्थिव शरीरों के निकट जाने का साहस नहीं कर पा रहा था। शत्रु का स्पष्ट आदेश था कि कोई भी शहीदों का अंतिम संस्कार न करे, ताकि भय का वातावरण बना रहे।

ऐसे समय में, जब पुरुष, सैनिक और ग्रामीण तक भय से पीछे हट चुके थे, तब एक साधारण किंतु असाधारण साहस से परिपूर्ण ख़ालसा महिला आगे बढ़ी। ख़ालसा परंपरा में जिनका नाम माता शरण कौर के रूप में स्मरण किया जाता है। उन्होंने न तो मुगल सैनिकों के भय की परवाह की, न अपने प्राणों की।

माता शरण कौर ने अंधकार में, चुपचाप, शहीद साहिबज़ादों के शरीरों को युद्धभूमि से उठाया। उस क्षण न कोई शंखनाद था, न कोई उत्सव—केवल आंसू, श्रद्धा और अटूट भक्ति थी। उन्होंने साहिबज़ादा अजीत सिंह जी और साहिबज़ादा जुझार सिंह जी को पूर्ण सम्मान और मर्यादा के साथ एकत्र किया।

मुगल पहरेदारों की आँखों से बचते हुए, माता शरण कौर ने सनातनी मर्यादा के अनुसार दोनों वीर शहीदों का अंतिम संस्कार किया। उस समय न लकड़ियाँ पर्याप्त थीं, न साधन— परंतु श्रद्धा इतनी प्रबल थी कि वही अग्नि बन गई।

यह केवल अंतिम संस्कार नहीं था — यह अत्याचार के विरुद्ध मौन विद्रोह था। यह घोषणा थी कि खालसा के शहीद अपमानित नहीं होंगे, चाहे सत्ता कितनी भी क्रूर क्यों न हो।

इतिहास में स्थान

माता शरण कौर का यह कार्य खालसा इतिहास में नारी साहस, सेवा और धर्मनिष्ठा का अमर प्रतीक बन गया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म की रक्षा केवल तलवार से नहीं, बल्कि श्रद्धा, साहस और करुणा से भी होती है।

हमें क्या सिखाती हैं?

🌺 माता शरण कौर केवल एक नाम नहीं — वे उस मौन शक्ति की प्रतीक हैं, जिसने शहादत को अपमान से बचाया, और यह सिखाया कि जब धर्म संकट में हो, तब स्त्री और पुरुष का भेद मिट जाता है — केवल साहस शेष रह जाता है।

✨ माता शरण कौर, आपके अदम्य साहस और महान बलिदान को कोटि-कोटि नमन। आपका पावन नाम सदा इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित रहेगा और सनातनी वेदान्तियों के हृदयों में युगों-युगों तक अमर रहेगा। ✨