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माता भग कौर

माता भग कौर

परिचय

माता भग कौर, जिन्हें इतिहास में श्रद्धा से माई भागो कहा जाता है, 17वीं शताब्दी की सबसे महान और प्रसिद्ध ख़ालसा महिला योद्धा थीं। वे साहस, बलिदान और धर्मरक्षा की जीवंत प्रतिमूर्ति थीं। ख़ालसा इतिहास में उनका स्थान एक ऐसी वीरांगना का है, जिसने युद्धभूमि में अपने शौर्य से अमरता प्राप्त की।

कौन थीं माता भग कौर (माई भागो)?

माता भग कौर का जन्म 17वीं शताब्दी में एक ख़ालसा परिवार में हुआ। बचपन से ही उनमें निर्भीकता, आत्मबल और युद्ध-कौशल के गुण स्पष्ट दिखाई देते थे। उस युग में जब महिलाओं को युद्ध से दूर रखा जाता था, माई भागो ने शस्त्र उठाकर यह सिद्ध किया कि धर्म और न्याय की रक्षा में नारी भी अग्रिम पंक्ति में खड़ी हो सकती है।

चालीस मुक्तों को पुनः प्रेरित करना

मुग़ल अत्याचारों के कठिन काल में, चालीस ख़ालसा योद्धा भयवश गुरु गोबिंद सिंह जी का साथ छोड़ चुके थे। माई भागो ने इसे ख़ालसा मर्यादा के विरुद्ध माना। उन्होंने उन योद्धाओं को ललकारा, उनके भीतर फिर से साहस और धर्मभावना जगाई और स्वयं उनका नेतृत्व करते हुए उन्हें युद्ध के लिए तैयार किया। यही योद्धा आगे चलकर चालीस मुक्ते कहलाए।

मुक्तसर का युद्ध (1705)

वर्ष 1705 में खिदराना (आज का श्री मुक्तसर साहिब) में माई भागो ने मुग़ल सेना के विरुद्ध अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन किया। उन्होंने युद्धनीति, जंगलों और भू-भाग का उपयोग कर शत्रु को भ्रमित किया और अंत तक डटकर संघर्ष किया। इस युद्ध में चालीस मुक्ते वीरगति को प्राप्त हुए, जिनको गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुक्त घोषित किया।

शस्त्र-विद्या और युद्ध-कौशल

माता भग कौर तलवार, भाला और धनुष-बाण चलाने में निपुण थीं। वे एक साधारण सैनिक नहीं, बल्कि एक कुशल योद्धा और सेनापति के रूप में जानी जाती थीं। युद्धभूमि में उनका साहस और नेतृत्व शत्रुओं के लिए भय का कारण बन जाता था।

गुरु गोबिंद सिंह जी की अंगरक्षक

मुक्तसर के युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी माई भागो जीवित रहीं। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उनके त्याग और पराक्रम से प्रभावित होकर उन्हें अपने साथ रखा। इसके बाद उन्होंने पुरुष वेश में रहकर गुरु जी की निजी अंगरक्षक के रूप में सेवा की और शेष जीवन भक्ति, तपस्या व सेवा में व्यतीत किया।

इतिहास में स्थान

माता भग कौर ख़ालसा इतिहास की सबसे महान नारी योद्धा मानी जाती हैं। वे न केवल ख़ालसा की शान हैं, बल्कि नारी शक्ति, आत्मसम्मान और धर्मरक्षा की अमर प्रेरणा भी हैं। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि साहस और बलिदान लिंग का मोहताज नहीं होता।

✨ “माता भग कौर (माई भागो), आपके अदम्य साहस, बलिदान और धर्मनिष्ठा को शत्-शत् नमन।”

आपका नाम सदैव ख़ालसा इतिहास और श्रद्धालुओं के हृदयों में अमर रहेगा। वेदांतियों के हृदय में आप सदा सम्मान और श्रद्धा के पात्र रहेंगे।✨